Intro
कभी-कभी डर सिर्फ अहसास नहीं होता — वो एक परछाई बनकर आपके पीछे चलता है… और फिर हमला करता है।
डर की गूंज – भाग 2: परछाई का पहला हमला
उसने अपनी डायरी खोली और पहला नोट लिखा —
“गांव में कोई नहीं है… लेकिन ऐसा लगता है जैसे कोई मुझे देख रहा है।”
टॉर्च की रोशनी और आंखें
रात के लगभग 12 बज रहे थे। विक्रम एक जली हुई कोठरी की ओर बढ़ा। उसने जैसे ही दरवाज़ा खोला, सामने दीवार पर कुछ लिखा था —
"तुम वापस नहीं जा पाओगे…"
विक्रम ने तुरंत टॉर्च घुमाई, और तभी…
दीवार की परछाई हिलने लगी… जबकि विक्रम बिल्कुल स्थिर था।
परछाई का पहला हमला
वो परछाई अब फैल रही थी। विक्रम को महसूस हुआ जैसे किसी ने उसकी गर्दन पर हाथ रखा हो।
उसका दम घुटने लगा। वह लड़खड़ा गया और नीचे गिर पड़ा।
आंखें खुलीं — तो सामने वही परछाई अब एक आकृति में बदल चुकी थी, बिना चेहरा, सिर्फ एक काली, धुंधली रूह।
विक्रम ने कांपती आवाज़ में कहा, “तुम कौन हो…?”
आवाज़ आई —
"तुमने हमें क्यों जगा दिया..."
बचाव या धोखा?
किसी तरह विक्रम ने अपने पास रखा लॉकेट (जो उसे उसकी दादी ने दिया था) सामने किया।
परछाई एक पल को रुकी, झटके से पीछे हटी और गायब हो गई।
विक्रम वहीं बैठा रहा, सांसें तेज़, और शरीर कांपता हुआ।
भाग 2 समाप्त
लेकिन क्या विक्रम अब सुरक्षित है?या ये सिर्फ था पहला हमला?
गांव की परछाइयां अब जाग चुकी हैं…
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