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अस्सलामु अलैकुम – जुमा मुबारक गुड मॉर्निंग इस्लामिक शायरी | दिल को छूने वाली शुभ सुबह

 10 Islamic Shayari With Human Touch + Intro Lines


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"हर सुबह की दुआ है तुझ तक पहुँचे, तेरे दिन की शुरुआत बरकतों से हो जाए।"


जब कोई आपको अल्लाह के नाम से सुबह-सुबह याद करे, तो समझो रिश्ता रूह से जुड़ा है।


"जुमा मुबारक हो उस शख्स को, जिसने नमाज़ की आवाज़ में चैन ढूंढ लिया।"


जुमे की सुबह हर उस दिल के लिए सुकून लाती है जो रब से जुड़ा होता है।


"अस्सलामु अलैकुम कह देना भी एक इबादत है, क्योंकि इसमें मोहब्बत भी है और दुआ भी।"


एक छोटा सा सलाम किसी का दिन बना सकता है।


" हर सुबह की रौशनी ये पैगाम लाती है, कि तौबा का दरवाज़ा अब भी खुला है।"


अल्लाह कभी देर करता है, मगर कभी इनकार नहीं करता।


"जुमा के दिन की दुआएं कबूल होती हैं, बस एक सच्चा दिल चाहिए माँगने वाला।"


अल्लाह के दरबार में खाली हाथ भी दुआओं से भर जाते हैं।


"जिस दिन से रब को दिल से पुकारा, हर सुबह मेरी रहमत बन गई।"


जब अल्लाह आपकी सुबह बनाए, तो दिन भर बरकतें बरसती हैं।


"सुबह की नमाज़ में जो सुकून है, वो किसी रात की नींद में नहीं।"


अल्लाह की याद में जो चैन है, वो दुनिया की किसी दौलत में नहीं।


"जो अल्लाह को याद करता है सुबह-सुबह, उसका दिन बुराई से महफूज़ रहता है।"


सुबह का ज़िक्र आपकी सारी मुश्किलें आसान कर देता है।


"हर सुबह का सलाम है तुझ पर, रब की रहमतें हों हर पल।"


दिल से निकली दुआ कभी खाली नहीं जाती।


"गुड मॉर्निंग नहीं, अस्सलामु अलैकुम कहो, क्योंकि इसमें बरकत है, मोहब्बत है और इस्लाम की पहचान है।"


जब सुबह अल्लाह के नाम से शुरू हो, तो दिन कभी खराब नहीं होता।



सुबह की शुरुआत कैसी हो, ये दिनभर की बरकत का आधार बनती है। और अगर वो सुबह जुमा के दिन की हो, तो समझिए ये हज़ारों रहमतों और बरकतों का पैगाम है।

“अस्सलामु अलैकुम” कहना सिर्फ एक इस्लामिक सलाम नहीं, बल्कि उस रिश्ते की पहचान है, जिसमें मोहब्बत, एहतराम और दुआएं बसी होती हैं।


जुमा मुबारक का दिन मुसलमानों के लिए सबसे अफज़ल दिन माना गया है। इस दिन की सुबह खास होती है क्योंकि अल्लाह ने इसमें बेइंतेहा रहमतें रखी हैं।

जुमा की सुबह को एक अच्छा मौका समझिए खुद को संभालने का, अपने रब से जुड़ने का और दिलों को सुकून देने का।

हर नमाज़, हर सलाम, हर दुआ – इस दिन और इस सुबह को और भी पाक बना देती है।


आजकल की तेज़ ज़िन्दगी में हम बहुत कुछ भूल जाते हैं – अपने रब को, उसकी नेमतों को, और अपने दिल की सच्ची पुकार को।

लेकिन जुमा की सुबह एक रिमाइंडर है कि हम अब भी लौट सकते हैं, अब भी रो सकते हैं, और अल्लाह अब भी सुन रहा है।


इन शायरी के जरिए हमने कोशिश की है कि उस सुकून को शब्दों में पिरो सकें, जो अल्लाह की याद में मिलता है।

अगर ये शायरी आपके दिल को छूती है, तो इसे दूसरों तक भी पहुंचाइए, क्योंकि अल्लाह की बातें जितनी फैलाई जाएं, उतनी ही रहमतें बरसती हैं।




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