डर की गूंज – भाग 3: आखिरी घंटी की आवाज़ | Echoes of Fear – Part 3: The sound of the last bel
विक्रम की आंखें अब नींद से नहीं, डर से खुली थीं। पिछली रात जो हुआ, वो कोई सपना नहीं था — वो हकीकत थी। उसने अपनी डायरी में लिखा:
“यह गांव सच में जीवित है… पर इंसानों से नहीं, रूहों से।”
सुबह का सूरज तो निकला, लेकिन गांव में उजाला कहीं नज़र नहीं आया। धुंध अब भी छाई हुई थी, और हवाओं में एक मनहूस सन्नाटा गूंज रहा था।
एक पुरानी इमारत
गांव की एक पुरानी टूटी-फूटी इमारत विक्रम को दूर से दिखी। पास जाकर देखा तो वो एक पुरानी स्कूल थी। टूटी हुई खिड़कियाँ, अंदर बेंचें उलटी पड़ी थीं, और दीवारों पर बच्चों की आवाज़ों की गूंज अब भी मानो जमी हुई थी।
वह जैसे ही अंदर गया —
टन्… टन्… टन्…
घंटी बजी।
विक्रम डर के मारे वहीं रुक गया। उसकी सांसें रुक सी गईं।
“यहां तो कोई नहीं है… फिर ये घंटी कैसे बजी?”
स्कूल की डायरी
विक्रम को एक पुरानी स्कूल की डायरी मिली, जिस पर नाम लिखा था —
"आशा वर्मा - कक्षा 6वीं"
डायरी में आखिरी पन्ने पर कुछ टेढ़े-मेढ़े शब्द थे:
“वो आज फिर आया… हमारे मास्टर जी को ले गया… अगली बारी मेरी है…”
विक्रम कांप उठा।
क्या यह स्कूल कभी बच्चों से भरा रहता था? क्या यहां कुछ ऐसा हुआ था जिसे छिपाया गया?
बेंच पर बैठा साया
जैसे ही विक्रम ने डायरी बंद की
क्लासरूम की सबसे पिछली बेंच पर एक परछाई बैठी हुई थी।
धीरे-धीरे वो उठी, और विक्रम की ओर देखने लगी।
उसका चेहरा एकदम काला, और आंखें एकदम सफेद थीं।
पर वो सिर्फ खड़ी रही। कुछ कहा नहीं… बस देखती रही…
भागने की कोशिश
विक्रम ने दौड़ लगाई, स्कूल से बाहर भागा, और पीछे मुड़कर देखा
वो परछाई दरवाज़े पर खड़ी थी… और मुस्कुरा रही थी।
वो आवाज़ में बोली:
"घंटी सिर्फ उनके लिए बजती है… जो अगला शिकार बनने वाले होते हैं…"
सच के करीब
विक्रम अब समझ चुका था यह गांव सिर्फ भूतिया नहीं, एक भयानक सच्चाई छिपाए बैठा है।
वो गांव के प्राचीन मंदिर के बारे में सुन चुका था। अगला कदम वहीं जाना है…
लेकिन क्या वो तैयार है उस आखिरी राज़ से मिलने के लिए?
भाग 3 समाप्त
अगले भाग में: विक्रम पहुंचेगा उस मंदिर में जहां सब कुछ शुरू हुआ था… और जहां सब कुछ खत्म होगा।
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